Sunday, April 25, 2010

इतिहास की भारतीय परिभाषा और प्रयोजन

इतिहास की भारतीय परिभाषा और प्रयोजन

धर्मार्थ काम मोक्षनामुपदेषम समन्वितम ।

पूर्व वृतं कथायुक्तन इतिहास प्रचक्षते ॥



महाभारत के अनुसार घटी घटनाओं का वह वर्णन जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला सिद्ध हो वह इतिहास है।

इतिहास सैकड़ों, hazaaron, लाखों साल का हो सकता है। क्या लिखें और क्या छोड़ें, पूरा लिखना तो असंभव और निरर्थक है। अत: कहा गया है की जिससे समाज का लौकिक (अर्थ और काम) तथा पारलोकिक (धर्म और मोक्ष) की प्राप्ति हो और उसकी प्रेरणा मिले, इतिहास की घटनाओं का वह वर्णन, उस प्रकार से होना चाहिए।

आधुनिकता के अहंकार के मारे इतिहासकार अभी तक नहीं समझ पा रहें हैं कि iतिहास कि कसौटी क्या है। अपने अपने समूहों, दलों, विचारधाराओं और अपने व्यापारिक स्वार्थों को साधने के लिए इतिहास लिखने लिखवाने का काम सत्ता और संपत्ति के दम पर चल रहा है। सबके कल्याण कि सोच उसमे नहीं है।

ठीक इसी प्रकार मीडिया में भी यह विवेक और दृष्टि पूरी तरह गायब है कि समाज, राष्ट्र और मानव कल्याण को ध्यान में रख कर कितना, क्या परोसना है और क्या नहीं। अधिकार और समाचार के नाम पर हिंसा, गंदगी, व्यवस्थाओं को तोड़ने का काम खूब जोर शोर और पूरी नासमझी और नालायकी से हो रहा है।

ये सब मिल कर एक ऐसा गधा खोद रहें हैं जिसमे इन्हें भी गिरना ही है। इनके बेटे, बेटियां, भाई, बहन, पति, पत्नी ऐसे गंदे, अपराधी और संस्कार-विहीन समाज में सुखी और सुरक्षित कैसे रह पायेंगें, जिसका निर्माण ये मीडिया के मालिक कर रहें हैं।

एक नरक कि रचना बड़ी म्हणत से कि जा रही है। सबके विनाश के बीज बड़ी तेजी से अंधाधुंध बो रहे हैं। शायद अब आधुनिक दुर्योधन, कंस और रावणों को किसी क्रिशन और राम कि जरूरत नहीं है। अपना विनाश ये स्वयं करेंगे, कर रहें हैं। सज्जन शक्तियां अपनी निष्क्रियता का दंड इनके साथ भोगेंगी और भोग रहीं हैं। कलियुग में अब कृष्ण को कौरवों-यादवों के विनाश के लिए किसी मुसल और अर्जुन कि जरूरत नहीं। सृष्टि का नियम है, बेकार और अति का विनाश। जो देख सकतें हैं, वे इसे देख रहें हैं। इतना बड़ा विनाश क्या सचमुच ईश्वर इच्छा है? कमाल है! भावी अंत हमारा स्वयं प्रायोजित है।



संजीव शर्मा

निरीक्षक

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