आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अनेक भूलें करते जाते हैं और उसके दुष्परिणामों को भुगतते हैं। पश्चिमीकरण को ही आधुनिकता समझने की भूल में सुधार न करने की हानियाँ हमें हो रहीं हैं। पर अपनी भटकी सोच के कारण हम उसे समझ नहीं पा रहे। ऐसी ही अनेक भूलों में से एक है गर्मियों में भी बूट-जुराब पहनना। इस सामान्य रूप से प्रचलित गलत परम्परा के हो रहे दुष्परिणामों से हम पूरी तरह से अनजान हैं और इस गलत परम्परा को सभ्यता का मापदंड मान कर इसे अपनाये हुए हैं। परिणाम स्वरुप उच्च रक्तचाप, मानसिक तनाव, थकावट, बैचेनी, अनिद्रा आदि अनेक रोगों के इलावा, गुर्दे, हृदय, पाचन तंत्र पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। आप हैरान होंगे कि ऐसा कैसे संभव है? पर यही वास्तविकता है।
पावों के तलवे हमारे सारे शरीर तंत्र को गहराई से प्रभावित करते हैं। स्मरण रहे कि पाँव गरम पानी से धोने पर शारीरिक व मानसिक थकावट दूर हो कर सुखद नींद आ जाती है। गर्मियों में जूते उतार कर ठन्डे पानी से पाँव धोने पर तरो-ताज़ा अनुभव होने लगता है। स्नान करते समय तेल से अंगूठों कि मालिश करने से दृष्टि तेज होने लगती है। सोते समय पाँव के तलवों पर सरसों के तेल कि मालिश से अधिकाँश रोगियों का पुराना सर दर्द भी चंद दिनों में ठीक हो जाता है। 5-7 मिनट बजरी पर नंगे पाँव कदम-ताल करने से लगभग सभी रोगों में लाभ होने लगता है। बवासीर जैसे कष्टकारी रोग कि चिकित्सा के लिए इन्द्रायण फल के गुर्दे को कुछ देर पाँव पे मसलने पर दो चार दस्त आकर बवासीर सदा के लिए ठीक हो जाती है।
उच्च रक्तचाप का रोगी यदि देसी या पहाड़ी गौ के गोबर और गौमूत्र के घौल में पाँव रख कर घंटा, दो घंटा बैठे तो रक्तचाप चंद दिन में ठीक हो जाता है। रोज नंगे पाँव कुछ देर टहलने मात्र से अनेक मानसिक और शारीरिक रोग ठीक होने लगते हैं, जबकि नायलोन, प्लास्टिक की चप्पल, जुराब, पतावों के कारण मानसिक व शारीरिक रोग या तो पैदा होते हैं या बढ़ने लगते हैं।
इतने महत्वपूर्ण और संवेदनशील पैरों कि हम कैसी दुर्दशा कर रहें हैं। गर्मियों के मौसम में जूते-जुराब पहन कर हम अपने पैरों को सड़ाते रहते हैं। बूट-जुराब उतारने पर कितनी दुर्गन्ध फैलती है पर आप इसका कारण व समाधान न जानने के कारण इसे मजबूरी मैं सहन करते जा रहे हैं।
जितनी दुर्दशा आपके पाँव कि होती है, उसका उतना ही बूरा प्रभाव आपके दिमाग तथा शरीर के अन्य अंगों पर होता है।
सबसे बड़ी दुर्दशा तो हम अपने कोमल बच्चों कि करते हैं। भरपूर गर्मियों में उन्हें बूट-जुराब पहन कर स्कूल जाना पड़ता है। घबराहट, चक्कर और बैचेनी, थकावट का शिकार बनते बनते धीरे धीरे उनका शरीर तंत्र बचपन में ही रोगी और दुर्बल बन जाता है। उनके शरीर और बुद्धि का सही विकास भी नहीं हो पता।
अपने कोमल बच्चों पर कृपा करें और बूट-जुराब के स्थान पर (गर्मियों में) सैंडल, चप्पल आदि पहनाएं जिनके अन्दर के पतावे सिंथेटिक या फोम के बने न हों। आपके अपने लिए भी यही उचित होगा। बूट-जुराब के बिना आप स्वयं भी स्वस्थ और प्रफुल्लित अनुभव करेंगे।
मत भूलिए कि दक्षिण भारत के उच्च अधिकारी, व्यापारी तक साधारण चप्पल में या नंगे पाँव रहना पसंद करते हैं और हम उत्तर भारतियों से अधिक बुद्धिमान व कार्य करने में सक्षम हैं। कोई शक नहीं कि धीरे-धीरे वे भी सभ्यता समझे जाने वाली इस जूता अप-संस्कृति का शिकार बनने लगेंगे।
आधुनिकता कि अदूरदर्शी दोड़ का परिणाम है कि भारी हानि उठाकर भी हम प्रत्यक्ष कारणों को देखने कि समझ और दृष्टि गवां बैठे हैं।
हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता कि अधिकाँश परम्पराएँ हज़ारों वर्षो कि खोज और अनुभवों पर आधारित हैं। अत: उन्हें नकारने और आधुनिकता के नाम पर उल्टा-सीधा अपनाने की जल्दबाजी करना कल्याणकारी नहीं है। थोड़ा धेर्य से परख कर ही नए को अपनाना और पुराने को ठुकराना चाहिए। आधुनिकता का अर्थ यह तो नहीं की हम विनाश के गर्त में आँखें बंद करके गिरते ही चले जाएँ।
पांवों में भरी भरकम जूते-जुराब के पहनने की परम्परा यूरोपियों के साथ भारत में आई। शीतल प्रदेशो के निवासियों के लिए यह स्वाभाविक है पर इंग्लैंड के निचले तबके में प्रचलित टाई की तरह जूते भी हमारी प्रतिष्ठा और सभ्यता का प्रतीक कब बन गए? पता ही नहीं चला। पर अब तो अपनी स्वतंत्र बुद्धि से हित-अहित का विचार कर लेने में कोई बुराई नहीं।
अत: स्वस्थ रहने के लिए गर्मियों के दिनों में बूट-जुराब के स्थान पर सैंडल या चप्पल पहने। सर्दियों में जुराबें सूती या शुद्ध ऊन की पहने। कुछ देर रोज़ नंगे पाँव भी घूमें तो अनेक रोगों से बचे रहेंगे.
याद रखने की बात है कि पुराने शहरो में आज भी ऐसे लोगों को याद किया जाता है जो जीवन में कभी बीमार नहीं पड़े और न ही गर्मी-सर्दी का उन पर कभी कोई असर हुआ। स्पष्ट है की धरती के संपर्क में रहने से रोगों से रक्षा होती है और जीवनी शक्ति प्रबल बनी रहती है।
संजीव शर्मा
निरीक्षक